

"माल ले लिया, बिल भी आ गया, अब पेमेंट 90 दिन बाद करेंगे।" यह लाइन भारत के बाज़ार में सालों से चलती आई है। छोटे सप्लायर के पास कोई चारा नहीं था। बड़े खरीदार की शर्त माननी पड़ती थी, चाहे उसकी अपनी नकदी फंस जाए।
MSME 45 days payment rule इसी समस्या का जवाब है। यह नियम कहता है कि Micro और Small उद्यम से माल या सेवा लेने वाला खरीदार तय समय में भुगतान करे, नहीं तो उसे टैक्स में नुकसान होगा और ब्याज भी देना पड़ेगा।
इस लेख में हम सवाल-जवाब के तरीके से समझेंगे कि यह नियम क्या है, किस पर लागू होता है, 15 और 45 दिन कैसे गिनें, और 2026 में इसमें क्या बदला है।
यह दो कानूनों को जोड़कर बना नियम है:
सीधी भाषा में: समय पर भुगतान नहीं, तो उस साल टैक्स में छूट नहीं।
नहीं, नियम वैसा ही है, बस धारा का नंबर बदला है।
1 अप्रैल 2026 से नया Income-tax Act, 2025 लागू हुआ है। इसमें धारा 43B(h) वाला प्रावधान अब धारा 37(2)(g) के रूप में मौजूद है। मूल नियम वही है: तय समय में Micro और Small उद्यम को भुगतान नहीं किया, तो खर्च की छूट भुगतान वाले साल तक टल जाएगी।
जुलाई 2026 में राज्यसभा में दिए गए एक जवाब में सरकार ने भी साफ किया कि यह प्रावधान 45 दिन की समय-सीमा लागू करवाने के लिए है और इसमें कोई ढील नहीं दी गई है।
यह सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला सवाल है।
2024 में कई व्यापारी संगठनों ने सरकार से इस नियम को एक साल टालने की मांग की थी। लेकिन नियम टाला नहीं गया। धारा 43B(h) वित्त वर्ष 2023-24 (आकलन वर्ष 2024-25) से लागू है और आज तक लागू है। 45 दिन की सीमा को 90 दिन करने की मांग भी उठी, लेकिन ऐसा कोई बदलाव नहीं हुआ है।
अगर आप सोशल मीडिया पर "नियम टल गया" या "90 दिन हो गए" जैसी खबरें देखें, तो आधिकारिक अधिसूचना देखे बिना भरोसा न करें।
| स्थिति | नियम लागू? |
| सप्लायर Micro या Small उद्यम है और Udyam में पंजीकृत है | हाँ |
| सप्लायर Medium उद्यम है | नहीं |
| सप्लायर व्यापारी (Trader) है, यानी केवल खरीद-बिक्री करता है | आमतौर पर नहीं, क्योंकि यह नियम निर्माण और सेवा देने वाले उद्यमों के लिए है |
| खरीद पूंजीगत सामान (मशीन, उपकरण) की है | नहीं, यह नियम खर्च वाली खरीद पर लागू है |
| खरीदार कंपनी, फर्म, LLP या प्रोप्राइटर है जो सामान्य तरीके से खर्च घटाता है | हाँ |
| खरीदार अनुमानित कराधान (जैसे धारा 44AD) में है | आमतौर पर व्यावहारिक असर नहीं, क्योंकि वहां खर्च अलग से नहीं घटाए जाते। अपने CA से पुष्टि करें |
सप्लायर के लिए सलाह: अपना Udyam प्रमाणपत्र खरीदार को लिखित रूप में दें और इनवॉइस पर Udyam नंबर लिखें। खरीदार को पता ही नहीं होगा कि आप Micro या Small उद्यम हैं, तो नियम का फायदा लेना मुश्किल होगा।
खरीदार के लिए सलाह: हर सप्लायर से Udyam प्रमाणपत्र मांगें और उसकी श्रेणी (Micro, Small या Medium) और गतिविधि (निर्माण, सेवा या व्यापार) जांचें।
गिनती माल या सेवा स्वीकार करने की तारीख से शुरू होती है, बिल की तारीख से नहीं। अगर खरीदार डिलीवरी के 15 दिन के अंदर लिखित आपत्ति नहीं करता, तो माल को स्वीकार किया हुआ माना जाता है (इसे deemed acceptance कहते हैं)।
| समझौता | भुगतान की अंतिम सीमा |
| कोई लिखित समझौता नहीं | स्वीकृति से 15 दिन |
| लिखित समझौता 30 दिन का | स्वीकृति से 30 दिन |
| लिखित समझौता 45 दिन का | स्वीकृति से 45 दिन |
| लिखित समझौता 60 या 90 दिन का | फिर भी अधिकतम 45 दिन, क्योंकि कानून की सीमा 45 दिन है |
ध्यान दें: कॉन्ट्रैक्ट में 90 दिन लिख देने से 45 दिन की कानूनी सीमा नहीं बढ़ती।
उदाहरण 1: समय पर भुगतान दिल्ली की एक फर्नीचर कंपनी ने लुधियाना के एक Small उद्यम से ₹6 लाख का लकड़ी का सामान 1 फरवरी 2026 को स्वीकार किया। लिखित समझौता 45 दिन का है, यानी अंतिम तारीख 18 मार्च 2026 है। कंपनी ने 15 मार्च को भुगतान कर दिया। कोई समस्या नहीं। ₹6 लाख का खर्च वित्त वर्ष 2025-26 में ही घट जाएगा।
उदाहरण 2: देर से भुगतान, 31 मार्च तक बकाया उसी कंपनी ने 10 जनवरी 2026 को एक और ₹4 लाख का सामान लिया, बिना लिखित समझौते के। अंतिम तारीख 25 जनवरी 2026 थी। कंपनी ने 31 मार्च 2026 तक भुगतान नहीं किया और 20 मई 2026 को भुगतान किया। नतीजा: ₹4 लाख का खर्च 2025-26 में नहीं घटेगा। वह 2026-27 में घटेगा, जब भुगतान हुआ। साथ ही, देरी के लिए ब्याज भी देना होगा।
उदाहरण 3: 31 मार्च तक समय-सीमा पूरी ही नहीं हुई अगर सामान 1 मार्च 2026 को लिया गया और 45 दिन का समझौता था, तो अंतिम तारीख 15 अप्रैल 2026 है। 31 मार्च को रकम बकाया है, लेकिन समय-सीमा अभी पूरी नहीं हुई। ऐसे में 2025-26 में खर्च की छूट नहीं रुकेगी, बशर्ते 15 अप्रैल तक भुगतान हो जाए।
MSMED Act की धारा 16 के अनुसार, देर से भुगतान पर खरीदार को RBI बैंक रेट का तीन गुना ब्याज देना होता है, जो मासिक चक्रवृद्धि (monthly compounding) से जुड़ता है। अगर बैंक रेट 5.50% है, तो यह लगभग 16.5% सालाना बनता है, और मासिक चक्रवृद्धि से असल बोझ इससे भी ज़्यादा होता है।
यह ब्याज भी टैक्स में खर्च के रूप में घटाया नहीं जा सकता (MSMED Act की धारा 23)। यानी देरी दो बार चोट करती है: पहले खर्च की छूट टलती है, फिर ऐसा ब्याज देना पड़ता है जिस पर कोई टैक्स छूट नहीं मिलती।
बैंक रेट RBI समय-समय पर बदलता है, इसलिए गणना से पहले RBI की वेबसाइट पर मौजूदा दर ज़रूर देखें।
जिन कंपनियों का Micro या Small सप्लायर को भुगतान 45 दिन से ज़्यादा बकाया रहता है, उन्हें MCA में MSME Form 1 हर छमाही में भरना होता है। इसमें बकाया रकम और देरी का कारण बताना होता है। विस्तार से जानने के लिए हमारा MSME Form 1 गाइड पढ़ें।
सबसे पहले ईमेल या पत्र से लिखित रिमाइंडर भेजें, जिसमें इनवॉइस नंबर, स्वीकृति तारीख, बकाया रकम और MSMED Act की धारा 15 का ज़िक्र हो।
भुगतान न मिलने पर MSME Samadhaan पोर्टल पर ऑनलाइन शिकायत करें। मामला राज्य की Micro and Small Enterprises Facilitation Council (MSEFC) के पास जाता है।
MSEFC पहले सुलह (conciliation) कराती है। सुलह न होने पर मध्यस्थता से फैसला होता है, जिसमें ब्याज सहित भुगतान का आदेश दिया जा सकता है।
नकदी की तत्काल ज़रूरत हो तो TReDS पर अपने इनवॉइस भुना सकते हैं। इससे बड़े खरीदारों के बिल पर जल्दी पैसा मिल जाता है। हमारा TReDS गाइड देखें।
1. MSME 45 days payment rule क्या है? Micro और Small उद्यम को लिखित समझौते पर 45 दिन और बिना समझौते के 15 दिन में भुगतान करना होता है। देर होने पर खरीदार की खर्च की छूट भुगतान वाले साल तक टल जाती है।
2. क्या यह नियम Medium उद्यम पर लागू होता है? नहीं। यह नियम केवल Micro और Small उद्यमों से की गई खरीद पर लागू होता है।
3. क्या व्यापारियों (Traders) से खरीद पर यह नियम लागू है? आमतौर पर नहीं। यह नियम निर्माण और सेवा देने वाले Micro और Small उद्यमों के लिए है। अपने CA से पुष्टि करें।
4. क्या MSME 45 days payment rule टल गया है? नहीं। मांग के बावजूद नियम टाला नहीं गया। 1 अप्रैल 2026 से यह नए Income-tax Act, 2025 की धारा 37(2)(g) में जारी है।
5. 45 दिन की गिनती कब से होती है? माल या सेवा स्वीकार करने की तारीख से। 15 दिन में आपत्ति न हो तो डिलीवरी की तारीख से स्वीकृति मानी जाती है।
6. क्या 90 दिन का समझौता करने से समय बढ़ सकता है? नहीं। कानून की अधिकतम सीमा 45 दिन है, चाहे समझौते में कुछ भी लिखा हो।
7. देर से भुगतान पर कितना ब्याज लगता है? RBI बैंक रेट का तीन गुना, मासिक चक्रवृद्धि के साथ। यह ब्याज टैक्स में खर्च के रूप में नहीं घटता।
8. सप्लायर भुगतान न मिलने पर कहां शिकायत करे? MSME Samadhaan पोर्टल पर। मामला राज्य की MSEFC के पास जाता है, जो सुलह या मध्यस्थता से निपटाती है।
MSME 45 days payment rule सिर्फ टैक्स का नियम नहीं है। यह छोटे उद्यमों की नकदी बचाने का कानूनी हथियार है। सप्लायर को अपना Udyam पंजीकरण दिखाना चाहिए, और खरीदार को अपनी पेमेंट प्रक्रिया 15 और 45 दिन के हिसाब से बनानी चाहिए। 2026 में धारा का नंबर बदला है, नियम नहीं।
अगर आप Micro या Small उद्यम हैं और अभी तक Udyam में पंजीकृत नहीं हैं, तो इस नियम का फायदा लेने का पहला कदम वही है। StartupFlora की टीम MSME Udyam रजिस्ट्रेशन, अकाउंटिंग और अनुपालन में आपकी मदद कर सकती है। हमारी टीम से संपर्क करें।
अंग्रेज़ी में विस्तार से पढ़ने के लिए हमारा MSME 45 Day Payment Rule गाइड देखें।